शान्ति और सम्मान, लौकिक जीवन और इस्लाम का विचार इच्छाओं और नैसर्गिक अभिलाषाओं में नियंत्रण

शान्ति और सम्मान

किसी व्यक्ति या किसी समुदाय की यह इच्छा कि संसार में उसे प्रतिष्ठा प्राप्त हो और आदर की दृष्टि से उसे देखा जाए, अत्यन्त स्वाभाविक है। लेकिन वास्तविक प्रतिष्ठा के लिए महानता चाहिए। धारणाओं की सत्यता, भावनाओं की सुन्दरता और चारित्रिक शक्ति के अभाव में न तो किसी महानता की कल्पना की सकती है और न ही ऐसी दशा में किसी के लिए हम किसी प्रतिष्ठा की आशा कर सकते हैं। प्रतिष्ठा उनके लिए होती है, जो दूसरों को गर्त से निकाल कर उन्हें उच्चता के शिखर पर खड़ा कर सकें, जिनका दृष्टिकोण संकुचित न हो, जो पूर्वाग्रह, अज्ञान और पक्षपात से बहुत ऊपर उठ चुके हों; जिनके विचार सत्य और तर्कसंगत हों; जिनकी भावनाओं और आचरण के मध्य एकात्मकता और सामंजस्य पाया जाता हो; जो जीवन के रहस्य से परिचित हों; जो जानते हों कि जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है और वे कौन-से चारित्रिक गुण हैं जिन पर जीवन की सफलता निर्भर करती है।

धर्म या संस्कृति की आधारशिला सत्य पर होनी चाहिए

जिस धर्म या संस्कृति की आधारशिला सत्य न हो उसकी कोई भी क़ीमत नहीं। जीवन को मात्र दुख और पीड़ा की संज्ञा देना जीवन और जगत् दोनों ही का तिरस्कार है। क्या आपने देखा नहीं कि संसार में काँटे ही नहीं होते, फूल भी खिलते हैं। जीवन में बुढ़ापा ही नहीं यौवन भी होता है। जीवन निराशा द्वारा नहीं, बल्कि आशाओं और मधुर कामनाओं द्वारा निर्मित हुआ है। हृदय की पवित्र एवं कोमल भावनाएँ निरर्थक नहीं हो सकतीं। क्या बाग़ के किसी सुन्दर महकते फूल को निरर्थक कह सकते हैं? एक छोटे-से पुष्प को निरर्थक नहीं कहा जा सकता, तो जीवन को, जो अपने में जाने कितनी सुन्दरता और गहराइयाँ लिये हुए है, कैसे अशुभ एवं असुन्दर कह सकते हैं? जीवन के प्रति वही दृष्टिकोण सत्य के अनुकूल हो सकता है, जिसमें विसंगतियाँ कदापि न हों; जो मानव को ऊँचा उठा सके; जो हमें तुच्छता से नहीं श्रेष्ठता से जोड़ सके। हम फिर कहेंगे, श्रेष्ठ वही हो सकते हैं, जो दूसरों को प्रतिष्ठित कर सकें; जो दूसरों की उदासी और निराशा को छीन सकें और उन्हें आशावान बना सकें; जिनका हृदय इतना विशाल हो कि वे संसार के सारे लोगों को कह सकें कि वे हमारे हैं।

इच्छाओं और नैसर्गिक अभिलाषाओं को नियंत्रण में रखना चाहिए

इच्छाओं और नैसर्गिक अभिलाषाओं को नियंत्रण में रखना इसलिए आवश्यक होता है ताकि हम अपना संतुलन न खो सकें। हमारी स्वभावजन्य इच्छाएँ और कामनाएँ न पाप हैं और न उन्हें दुख का मूल कारण कहा जा सकता है। दुख का कारण तो सदैव अज्ञान हुआ करता है। आप क़दम किस ओर उठाने जा रहे हैं? कहीं ऐसा न हो कि मानहीनता और अन्धकार से निकल कर मानहीनता और अन्धकार ही की ओर आप बढ़ रहे हों। प्रेम पूर्वक हम आपको आमंत्रित करते हैं कि आप ठहर कर इस्लाम का भी अध्ययन कर लें, जो पर्याय है मानव के उत्कर्ष का। अतः वास्तविक धर्म भी यही है। यह जीवन यातना नहीं हृदय-सखा का अनुग्रह है।

लौकिक जीवन के विषय पर इस्लाम का विचार

इस्लाम लौकिक जीवन के विषय में कहता है कि यह एक अनन्त और सुन्दरतम जीवन का सांकेतिक निमंत्रण है। यह किसी सुन्दर का मधुर सन्देश है। इससे बढ़कर दुर्भाग्य क्या होगा, यदि हम इस आमंत्रण का अवमान करते और सत्य से विमुख ही रहते हैं। याद रहे, इस्लाम संसार को त्याग देने की शिक्षा कदापि नहीं देता। यह यहाँ मानवों में जो चीज़ देखना चाहता है वह है: न्याय, प्रेम और करुणा! इस्लाम मनुष्य की श्रेष्ठता का पक्षधर है। इसका कहना है कि मनुष्य की श्रेष्ठता को कोई छीन नहीं सकता। हाँ, यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति या समुदाय स्वयं अपनी श्रेष्ठता को न समझ सके और श्रेष्ठता के प्रतिकूल कर्म करने लग जाए। इस प्रकार उसकी श्रेष्ठता धूमिल या नष्ट हो कर रह जाए। इस्लाम आपको वास्तविक प्रतिष्ठा और उच्चता की ओर बुलाता है, बुलाता रहेगा। काश! हमें अपने हित का ध्यान हो और हम इस बुलावे को रद्द न करें।


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