अवतारवाद, हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) सबके लिए, भारत और अरब के संबंध, भारतीय और अरब समाज मे समानताए

ईश्दूतत्व

लेखक डा0 नफीस अख्तर

जिस तरह मनुष्य को अपने भौतिक जीवन की रक्षा के लिए खाना, पानी, हवा और अन्य भौतिक वस्तुओं की ज़रूरत पड़ती है उसी तरह उसे अपने आध्यात्मिक , नैतिक, समाजिक जीवन के लिए मार्ग दर्शन की भी ज़रूरत है। मानव स्वयं अपना मार्गदर्शन कर पाने मे सक्षम नहीं है। उसका अल्प ज्ञान उसे भ्रमित और पथ भ्रष्ट कर देता है। उसके सामर्थ्य मे नहीं है कि वह मानव जगत के लिए बिना ईश्वरीय मार्गदर्शन के स्वयं कोई संविधान निर्मित कर सके। इसी लिए उस दयालु ईश्वर ने समय समय पर अपने दूत भेजे है जो मानव का पथप्रदर्शन करते रहे हैं.ताकि मानव जान सके कि

  1. उसके जीवन का उद्देश्य क्या है ?
  2. उसकी मंज़िल क्या है?। मरने के बाद क्या उस्का अंत हो जाता है ? या वह अपने वास्तविक स्थान पर पहुँच जाता है?
  3. उसके जीवन मे नैतिक्ता और आध्यात्म का क्या महत्व है तथा ऩैतिक्ता अथवा आध्यात्मिक्ता किसे कहते हैं?
  4. उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक, आर्थिक, राजनैतिक, और सामाजिक जीवन की व्यवस्था क्या और कैसी होनी चाहिए ?
  5. उसके रचयिता का परिचय क्या है और सृष्टि से उसकी योजना(creation plan) क्या है?
  6. सृषटि और स्रष्टा से मानव का सम्बंध क्या है या क्या होना चा हिए ?

यह वह बाते हैं जिस को इनसान ईश्वरीय प्रकाशना के बिना तथयात्मक रुप से कभी नहीं जान सकता। जो कुछ भी इस बारे मे उसके विचार होंगे वे केवल अनुमानों पर आधारित होंगे, ज्ञान पर नहीं। उसकी चेतन शक्ति केवल इसी निस्कर्ष पर पहुँच सकती है कि संभवतः ऐसा है , निसन्देह ऐसा ही है इस मोकाम तक पहुँचने मे वह असमर्थ ही रहेगा। अटकलों पर आधारित व्यवस्था अथवा व्यवहार हमेशा आत्मघाती साबित होता रहा है। पूंजीवाद को कभी इनसान सबसे अच्छी आर्थिक व्यवस्था समझता था। फिर उसके खूनी पंजों से घायल मानवता ने साम्यवाद की श्रण ली । साम्यवाद से अपना खूब शोषण कराने के बाद जब उसकी अक्ल ठिकाने आई तो उसने मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया। लेकिन मानवता आज भी शोषित और पददलित हो रही है।

जब मानव समाज ईश्वरीय जीवन व्यवस्था को त्याग कर खुद से जीवन संविधान बनाता है तो उसका अंजाम यही होता है कि दुनिया अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, शोषण, और युद्ध का क्षेत्र बन जाती है। अधर्म और बुराई का राज हर तरफ स्थापित होता है। ईश्वरीय मार्ग दर्शन ही मानव के लिए मुक्तिदाता है। ईश्वर मानव के पथप्रदर्शन के लिए उन्हीं मे से एक व्यक्ति को चयनित कर अपना दुत बनाता है। वह दूत ईश्वर की शिक्षाओं को लोगों तक पहुँचाने के साथ साथ एक आदर्श भी स्थापित करता है। उसने हर युग और हर देश मे अपने दूत भेजे।

कुरआन कहता है। हमने हर समुदाय मे एक दूत भेजा ( अध्याय 16 आयत 36) जब कभी ईश्दूत द्वारा पहूँचाई हुई ईश्वरीय शिक्षाएं और और उसके द्वारा स्थापित आदर्श लोग भूल जाते या उसमे मिलावट करके उसे असुरक्षित कर देते, और उसके फलस्वरुप हर तरफ अधर्म फैलने लगता तो पुनः धर्म की स्थापना और मानव समाज के मार्गदर्शन के लिए ईश्वर द्वारा एक नया दूत भेजा जाता। दूतों की श्रंखला की अंतिम कड़ी प्रेषित मुहम्मद (सल्ल0) हैं। उनके द्वारा जो धर्म हमतक पहुंचा है उसे स्वयं ईश्वर ने कुरआन के रूप मे प्रलय दिवस तक के लिए सुरक्षित कर दिया है। कुरआन अब न मिट सकता है और न उसमे कुछ घटाया बढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार प्रेषित मुहम्म्द (सल्ल0) का आदर्श जीवन और उनके द्वारा स्थापित आदर्श समाज का चित्रण ईतिहास के पन्नो मे पूरी तरह सुरक्षित है । अतः अब किसी नये ईश्दूत की आवश्यक्ता नहीं है।


अवतारवाद

ईश्वर की गलत पहचान से जुड़ी एक और अवैदिक मान्यता है अवतारवाद की मान्यता। कि जब पृथ्वी पर धर्म की ग्लानि होती है, अधर्म फैल जाता है, बुराई के मोकाब्ले अच्छाई की प्राजय होने लगती है, या अच्छे मनुष्यों का जीवन खतरे मे होता है ,तब ईश्वर धर्म की स्थापना और सज्जनों की रक्षा के लिए और दुर्जनों का नाश करने के लिए स्वयं किसी शरीरधारी प्राणी के रूप मे जन्म लेकर पृथ्वी पर पद्धारता है। और अपना उद्देश्य पूरा कर मृत्यु को प्राप्त होता है। इस प्रकार की यह मान्यता भी ईश्वर के स्वरूप से विपरीत तथा वेद शास्त्र के प्रतिकूल है। क्योंकि ईश्वर विभु है, अनन्त है। वह अनन्त प्रभु एक छोटे से शरीर मे कैसे आसकता है। आकार या शरीर की सीमाएं होती हैं। शरीर या आकर मे निहित शक्तियां भी सीमित होती हैँ इन सीमाओं मे असीम एवं सर्वशक्तिमान ईश्वर कैसे समा सकता है। ईश्वर सर्व सम्पन्न एवं सबसे निर्पेक्ष है। वह अभौतिक है।

यदि वह शरीर धारण करता है तो उसे भौतिक वस्तुओं की तरह समय,स्थान के बन्धनों मे बधना पड़ेगा। देश और काल का मोहताज होना पड़ेगा। यह सब उसके गुण स्वभाव से विपरीत है। ईश्वर जो पूरे ब्रहमाण्ड को बनाने वाला है, ब्रह्माण्ड के किसी भाग मे यदि कोई खराबी उत्पन्न होती है तो ईश्वर को उसे दूर करने के लिए जन्म लेना पड़े और उसे खुद संसार का एक हिस्सा बनना पड़े, ऐसा कदापि नहीं है। उस सर्वशक्तिमान के लिए यह पूरा संसार किसी व्यक्ति के हाथ मे लिपटे हुए एक छोटे से रूमाल से भी कम है। यदि उस रूमाल मे खराबी उत्पन्न हो जाए तो क्या उस खराबी को दूर करने के लिए उस व्यक्ति को पहले सवयं एक सूत मे परिवर्तित होकर उस रूमाल का हिस्सा बनना पड़ेगा। ऐसा मानना कैसी मूर्खता है। यदि उस ईश्वर को कुछ क्षुद्र दुष्ट व्यक्तियों को मारकर धर्म एवं सज्जनों की रक्षा के लिए शरीर धारण करना पड़े और खुद को इस भौतिक संसार का एक हिस्सा बनाना पड़े , इससे तो ईश्वर की दुर्बलता तथा असमर्थता ही सिद्ध होती है। क्या दुष्टों को मारना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना से अधिक कठिन है।

जिस ईश्वर ने शरीर धारण किए बिना सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है क्या बिना शरीर के दुष्टों को मारने मे असमर्थ होगया था। वेद तथा कुरान मे ईश्वर को अजन्मा व अमर कहा है। अजन्मा कभी जन्म नहीं लेता। लेगा तो उसके स्वभाविक गुणों के विपरीत होगा, जिससे उसकी सत्ता पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाएगा। क्योंकि जन्म, बालावस्था, यौवन तथा बुढ़ापा से होते हुए मृत्यु को प्राप्त होने का अर्थ है कि ईश्वर परिवर्तनशील है। परिवर्तनशीलता दुर्बलता तथा अनित्यता का प्रतीक है,जो ईश्वर के ईश्वरत्व के विरुद्ध है। सर्वशक्तिमान सत्ता का धनी ईश्वर तो अपने संकल्प मात्र से जो करना होता है करता है। बड़े से बड़ा आततायी, दुष्ट, अन्यायी का अन्त करना बिना अवतार के ही उसके लिए अति सरल और सम्भव है।

कुरान मे ईश्वर के सम्बंध मे बड़ा सुन्दरविवरण है कि वास्तविक तथ्य यह है कि धर्ती और आकाशों मे पाई जाने वाली सभी चीज़ों का वह मालिक है , सबके सब उसके आज्ञाकारी हैं। वह सम्पूर्ण संसार को ईजाद करने वाला है, और जिस बात का वह फैसला करता है ,उसके लिए बस वह आदेश देता है कि होजा बस वह होजाती है। ( अध्याय 2 आयत 117,118) कहो वह अल्लाह एक और अकेला है। अल्लाह सर्व सम्पन्न , सबसे निर्पेक्ष है और सब उसके मोहताज हैं। न उसकी कोई संतान है, न वह किसी की संतान । और कोई उसका समकक्ष नहीं है। ( अध्याय 112) ईसाई समुदाय ईसा मसीह को ईश्वर का बेटा मानता है। यदि ईश्वर की संतान होगी तो वह भी अनिवार्यतः ईश्वर होगी और उसका स्वभाव भी ईश्वरत्व होगा। इस प्रकार तो खुदा का ईश्वरत्व ही विभाजित होजाए गा। ईश्वरत्व के विभाजन का मतलब कायनात की सुचारु व्यवस्था का पतन है।कुरान मे कहा गया है कि और कहो प्रशंसा है उस अल्लाह के लिए जिसने न किसी को बेटा बनाया, न कोई ईश्वरत्व अथवा शासन मे उसका साझीदार है, और न वह बेबस है कि कोई उसका सहायक है। और उसकी बड़ाई बयान करो, उच्च कोटि की बड़ाई ( अध्याय 17 आयत111)


हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) सबके लिए

लेखक: डा0 मुहम्मद अहमद

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) सबके लिए'' मात्र एक आकषर्क नारा और मुसलमानों का दावा नही हैं, बल्कि एक वास्तविक, व्यावहारिक व ऐतिहासिक तथ्य है। 'सबके लिए' का स्पष्ट अर्थ हैं 'सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सर्वमान्य होना'। सार्वभौमिकता के परिप्रेक्ष्य में, हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के, भारतवासियों का भी पैगम्बर होने की धारणा तकाजा करती हैं कि आप (सल्ल0) के समकालीन भारत पर एक संक्षिप्त दृष्टि अवश्य डाली जाए, और चूकि आप की पैगम्बरी का ध्येय एवं आप (सल्ल0) के र्इशदूतत्व का लक्ष्य मानव-व्यक्तित्व, मानव-समाज के आध्यात्मिक व सांसारिक हर क्षेत्र मे सुधार, परिवर्तन, निखार व क्रान्ति लाना था, इसलिए यह दृष्टि भारतीय समाज के राजनैतिक, सामाजिक व धार्मिक सभी पहलुओं पर डाली जाए।


राजनैतिक परिस्थिति

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) द्वारा अरब प्रायद्वीप में इस्लाम के पुन: अभ्युदय का काल, सातवी शताब्दी र्इसवी का प्रारंभिक काल हैं। भारत, 'भारतवर्ष' या 'हिन्दुस्तान' नामक एक देश न था, न ही इसका कोर्इ एक शासक। अलग-अलग क्षेत्रों में 'पल्लव' और 'चालुक्य' आदि वंशो के शासकों-हर्ष वर्धन, महेन्द्र वर्मन और पुलकेशिन का राज्य था। इनमें सत्ता व शासन के लिए बराबर लड़ाइयॉं होती रहती थी। पराजय के पुनर्विजय-प्राप्ति के लिए वाह्य-देशों से सैनिक सहायता भी ली जाती थी। सत्ताधारी वर्ग के धर्म या धर्म-परिवर्तन का व्यापक प्रभाव शासित वर्ग ग्रहण करता था।


धार्मिक परिस्थिति

उत्तर-पश्चिमी प्रान्त में बौद्ध धर्म का हास हो रहा था। कश्मीर से मथुरा तक और मध्य-प्रान्त, पूर्वी तथा दक्षिणी प्रान्त में ब्रहम्मणों का प्रभाव बढ़ रहा था। जैन धर्म प्रभावहीन हो चुका था और जैनियों ने ब्राहम्मणों से समझौता करके उनका न केवल राजनैतिक व सांसारिक प्रभुत्व स्वीकार कर लिया था, बल्कि बड़े-बड़े लोगो का धर्म-परिवर्तन भी कराया जाने लगा था। जैन धर्म के अनुयायी महेन्द्र वर्मन (शासन काल 600-630 र्इ0) को संत अप्पर ने शैव धर्म ग्रहण करा दिया था जो शंकर का पुजारी बना और उसने महाबलिपुरम के प्रसिद्ध मन्दिर समेत कर्इ शैव-मन्दिर बनवाए, और जैन धर्म का बचा-खुचा अस्तित्व भी लगभग समाप्त हो गया। दूसरी ओर हासोन्मुख बौद्ध धर्म पर ब्राहम्मणवाद का ऐसा प्रबल प्रभाव पड़ा कि बौद्ध धर्म के मूर्तिपूजा-विरोधी अनुयायी, मूर्तिपूजा को अपने धर्म का खास अंग बना बैठे। बौद्ध जहॉ जाते वहां गौतम बुद्ध की मूर्तिपूजा न करने की मूल-शिक्षा के विरूद्ध उनकी मूर्तियों स्थापित करते और उनकी पूजा-अर्चना करने लगते।

एक प्रसिद्ध हिन्दू चिन्तक, सी0वी0 वैद्य के अनुसार, ''इस युग में हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म दोनो ही मूर्तिपूजा के समर्थक थे, बल्कि शायद बौद्ध धर्म मूर्तिपूजा में हिन्दू धर्म से भी आगे बढ़ गया था-।'' हिन्दू धर्म में वेदो द्वारा स्थापित एकेश्वाद, ऋग्वेद काल के अन्त तक पहुॅंचते-पहुॅचते 'अनेक-देवतावादी एकेश्वरवाद' में बदल चुका था। कुछ विद्वानों के अनुसार, वैदिक देवताओं की संख्या 33 तक और कुछ के अनुसार 3339 तक हो गर्इ थी जो पौराणिक काल में बढ़कर 33 करोड़ तक पहुॅच गर्इ थी, देवताओं की मूर्तियों के साथ-साथ पशु, नक्षत्र, नदी आदि भी पूज्य हो गए थें। हर्ष वर्धन के काल में शिवलिंग की पूजा आम हो गर्इ थी और विष्णु के अनेक अवतारो की मूर्तिपूजा प्रचलित हो गर्इ थी।


सामाजिक परिस्थिति

हर्ष वर्धन के पूर्वजों ने समाज में वर्ण-व्यवस्था की जड़ फिर से मजबूत करके ऊॅंचा-नीच श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ और छूतछात आदि को जो बढ़ावा दिया था, वह हर्ष वर्धन काल (606-647र्इ0) में बराबर जारी रहा। इस काल मे ंभारत की यात्रा करनेवाला चीनी यात्री फाहयान, लिखता है: शुद्र तो गए-गुजरे हैं ही, लेकिन शुद्रों में चांडाल सबसे अधम समझे जाते थे। वे राजज्ञानुसार, शहर में प्रवेश करते समय लकड़ी से ढोल बजाकर अपने आने की सूचना देते थे, ताकि लोग हट जाए और उनका स्पर्श बचाकर चले।'' सातवीं सदी के एक अन्य चीनी भारत-यात्री 'हवेनसांग' के अनुसार, '' शुद्रों के पश्चात, पंचम जाति के लोगो-कसाइयों, मछुआरो, जल्लादो और भंगियों के मकानों पर अलग-अलग निशान बने रहते थें और ये लोग नगर के बाहर रहते थे, उच्च वर्ग का कोर्इ आदमी रास्ते में मिल जाता तो ये ऑखें बचाकर बार्इ ओर को चले जाते और जल्दी से अपने घर में घुस जाते थे।'' इस काल मे स्त्रियों की दशा अति दयनीय था। रोमिला थापर के अनुसार, ''.................उत्तर भारत के कर्इस्थानों पर सती प्रथा जोर पकड़ती जा रही थी तो दखिण भारत में देवदासी प्रथा।................अनेक मंदिरों की देव-दासियां निर्लज्जतापूर्वक शोषित वैश्याएं बन गर्इ और मन्दिर के अधिकारी उनकी आय प्राप्त करने लगे।'' इंसानों को अन्य जीवन-सामग्री की तरह बेचने-खरीदनें और दास या दासी बनाने की प्रथा प्रचलित थी। डा0 रोमिला थापर के अनुसार, ''..................पुरूष और स्त्रियां या तो स्वयं को बेच देते थे या कोर्इ तीसरा व्यक्ति उन्हे बेच देता था, विशेषकर निर्धनता और अकाल की दशा में ऐसे लोग मन्दिर को बेच दिए जाते थे...........।''


भारत और अरब के संबंध

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के काल से बहुत पहले से ही भारत और अरब के बीच व्यावसायिक संबंध कायम थे। प्रसिद्ध विद्धान और अनुसंधानकर्ता सैयद सुलैमान नदवी के शब्दों मे, ''अरब व्यवसायी आज से हजारो वर्ष पूर्व भारत के तटीय क्षेत्रों मे आते-जाते थे, और वहॉ की वस्तुओं को मिस्र और ओम्मान के मार्ग से यूरोप तक पहुॅचाते थे और वहॉ की वस्तुओं को भारत के द्वीपो मे ंलाते थें। इस प्रकार के व्यावसायिक सामान को चीन और जापान तक ले जाते थें।'' मार्कोपोलो और वास्को डि गामा के समय तक भारत का व्यवसाय अरबों के हाथ में था। भारत से सन्दल, काफूर, लोग, जायफल, कबाबचीनी, नारियल, सोंठ अदरक, नील, अजवाइन, केला, सुपारी, रूर्इ के कपड़े, सन और बॉंस आदि चीजेंबेचने के लिए अरब ले जार्इ जाती थी।

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के काल मे भी यह व्यापार जारी था। भारत के कुछ लोग अरब के पूर्वी तटों और समीपवर्ती इलाकों में रहते थें। अरबो से उनके संबंध अच्छे थे। उनके बीच किसी लड़ार्इ-झगड़े की घटना इतिहास मे नही मिलती। हजरत मुहम्मद (सल्ल0) और आपके साथी हिन्दुस्तान और यहॉ के लोगो के बारे में जानकारी रखते थे, और आप (सल्ल0) के पैगम्बर बनाए जाने के बाद आपके पैगाम से यहॉ के लोग भी अवगत होने लगे थे।


भारतीय और अरब समाज मे समानताए

1- जिस अरब समाज मे हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को र्इश्वर ने अपना रसूल बनाया था, उसमें और समकालीन भारतीय समाज मे अनेक समानताएॅं पार्इ जाती थी। यहॉ ऐसी ही कुछ धार्मिक व सामाजिक समानताओं का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर देने से 'हजरत मुहम्मद सबके लिए' की धारणा को व्यावहारिक स्तर पर समझने मे आसानी होगी। धार्मिक समानताए भारत एक धार्मिक भू-स्थल था। यहॉ के लोगो में एक र्इश्वर के अस्तित्व पर विश्वास था। वे उसे सृष्टि, मनुष्यों व अन्य जीवधारियों का स्रष्टा समझते थे। यही स्थिति अरब प्रायद्वीप मे थी। वहॉ के लोग एक अल्लाह के वजूद के कायल थे। अल्लाह को ही सृष्टि, मानवजाति एवं समस्त जीवों को पैदा करने वाला मानते थे। यहॉ तक कि उनके नामों-उदाहरणत: 'अब्दुल्लाह' (अल्लाह का बन्दा) जैसे नाम से भी वे अपने और अल्लाह के बीच मूलभूत संबंध का प्रदर्शन करते थे।

2- अरबवासी अल्लाह के साथ दूसरों को साझीदार बना चुके थे। वे फरिस्तो, जिन्नो और पूर्वजों की मूर्तियों की पूजा करते थे। कभी एकेश्वरवाद के केन्द्र-स्वरूप बनाए गए 'काबा' में और उसके आस-पास, उन्होने लगभग 360 मूर्तियॉं स्थापित कर रखी थी और उनकी पूजा करते, उनके नाम पर बलि देते और उन पर चढ़ावे चढ़ावे तथा उनसे सहायता मांगते थें। मूर्तिपूजा की ठीक यही स्थिति और एक-र्इश्वर के साथ अनेकानेक देवताओं, नक्षत्रों एवं जीवधारी-अजीवधारी वस्तुओं को साझीदार बनाने का चलन भारत मे भी चरम सीमा पर था।

3- वैदिक धर्म के साथ-साथ भारत मे बौद्ध धर्म और जैन धर्म के माननेवाले भी थे। इसी प्रकार अरब मे 'बहुदेववादी एकेश्वरवाद' को माननेवाले 'मुशरिकों' के साथ-साथ अहले-किताब अर्थात यहूदी और र्इसार्इ भी रहते थे।

4- भारत मे तीर्थो, यज्ञो और बलि का प्रचलन था। अरब मे भी हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) द्वारा स्थापित हज, उमरा और कुरबानी के बिगड़े हुए रूप प्रचलित थे।


समाजिक समानताए

स्त्री की दशा अरब मे अच्छी न थी। वह केवल काम-वासना का साधन समझी जाती थी। समाज मे उसका कोर्इ गौरवपूर्ण स्थान न था। बेटियों को किशोरावस्था मे माता-पिता द्वारा मार दिए जाने और जिन्दा दफन कर देने का रिवाज था। भारत मे भी स्त्री का यौन-शोषण होता था, देवदासी प्रथा के रूप में वेश्यावृति का प्रचलन मे भी का यौन-शोषण होता था, देवदासी प्रथा के रूप

1- मे वेश्यावृति का प्रचलन था। तन्त्र-साधना के अन्तर्गत नारी का यौन अपमान होता था।

2- समाज, भारत मे उच्च वर्ग और तुच्छ वर्ग मे बंटा हुआ था। शुद्रो की दशा अति दयनीय थी। दासों और दासियों के रूप मे पुरूष, स्त्री खरीदे-बेचे जाते थे। अरब समाज मे गुलामी (slavery) की प्रथा पूरे जोर पर थी। पूरूषो, स्त्रियों को अन्य जीवन-सामग्री की तरह बेचा, खरीदा और काम में लाया जाता था। गुलामों और बांदियों की दशा अत्यन्त दयनीय थी। समाज मे उनकी हैसियत बिलकुल पशुओं जैसी थी। यह उस पूरे परिस्थिति का संक्षिप्त अवलोकन हैं जिसमें, और जिसे अरब में पूर्णतया बदलकर रख देने मे समर्थ हो जानेवाले हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) को अल्लाह ने एक सुधारक व क्रान्तिकारी पैगम्बर बनाकर भेजा था और आप (सल्ल0) केवल 21 वर्षो मे यह क्रान्ति ले आए । मानवता-उद्धार की यही वह प्रक्रिया थी जिसके दर्शन 1400 वष्र्ाीय विश्व-इतिहास मे होते हैं कि संसार के विभिन्न भागों समेत भारत में भी बड़ी जनसंख्या आप (सल्ल0) का पैगाम स्वीकार करके उसे सीने से लगाती रही और सिद्ध करती रही कि हजरत मुहम्मद (सल्ल0) सबके लिए हैं।

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