क्या मुसलमान हजरे अस्वद की पूजा करते हैं? हजरे अस्वद क्या है?

सवाल:क्या मुसलमान हजरे अस्वद (काबा की दीवार मे लगा काला पत्थर) की पूजा करते हैं? हजरे अस्वद क्या है?

उत्तर: हजरे अस्वद काबा के दक्षनी कोने में मौजूद लाली मिला हुआ एक काला पत्थर है जो ज़मीन से डेढ़ मीटर की उंचाई पर काबा की दिवार में लगा हुआ है. यहाँ यह बताते चलें कि शुरू में हजरे अस्वद का आकार तीस सेंटी मीटर के करीब था लेकिन अनेक घटनाओं की वजह से उस में परिवर्तन आता गया तथा अब अनेक साईज़ के केवल आठ छोटे छोटे टुकड़े बचे हैं जिन में सब से बड़ा छोहारे के आकार का है , यह तमाम टुकड़े करीब ढाई फिट के आयतन में जड़े हुए हैं जिनके किनारे चांदी के गोल चक्कर घेरे हुए है. इस की हिफाज़त के लिए इसे खालिस चांदी से मढ़वाया दिया गया है।

हजरे अस्वद को इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने तवाफ़ करने वालों (काबा का चक्कर लगाने वालों) के लिए काबा के दक्षिणी किनारे में लगाया था ताकि काबा का तवाफ़ करने वालों के लिए एक निशानी हो और वह यहीं से अपना तवाफ़ आरम्भ करें तथा यहीं पर समाप्त करें। तवाफ के लिए सात चक्कर लगाने होते हैं. इसलिए आवश्यक्ता हुई कि काबा की दीवार मे किसी जगह एक निशान लगा दिया जाए जहाँ से हाजी अपना तवाफ आरंभ करें और जहाँ पहुँच कर उनका एक चक्कर पूरा हो। बस इसी जरूरत के लिए इस पत्थर को काबा की दीवार मे लगाया गया है। वरना यह पत्थर आम पत्थरों जैसा ही है।

न इसमे कोई शक्ति है न कोई चमत्कार। कोई मुसल्मान न तो इसकी पूजा करता है न उसके सामने हाथ जोड़ता है। अब चूंकि यह पत्थर हज़रत इब्राहीम का स्मारक है इस लिए हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) और मुसल्मान इस पत्थर को चूमकर हज़रत इब्राहीम से अपनी मोहब्बत व्यक्त करते हैं। इसीलिए उमर रज़ियल्लाहो अन्हो ने जब हजरे अस्वद को चूमा तो कहा:

" मैं जानता हूँ कि तू केवल एक पत्थर है न तू नफा पहुंचा सकता है और न ही हानि अगर मैं ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तुझे चुमते हुए न देखा होता तो तुझे नहीं चूमता " इमाम तबरी फरमाते हैं कि:

"उमर रज़ियल्लाहो अन्हों ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि लोगों ने कुछ ही दिनों पहले बुतों कि पूजा को छोड़ा था तथा आप को डर हुआ कि कहीं यह लोग ये न समझने लगें कि पत्थर को चूमना उसकी ताजीम करना है जैसा कि इस्लाम से पूर्व अरब के लोग किया करते थे अतः उन्हों ने लोगों को यह बताना चाहा कि हजरे अस्वद का चूमना केवल अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कार्यों का अनुसरण है इसलिए नहीं कि उसके अन्दर कोई नफा तथा हानि की कोई शक्ति है " यहाँ पता चला कि हजरे अस्वद को चूमना कोई पूजा या शर्द्दा नहीं है बल्कि ऐसी मुहब्बत और प्यार है जो अल्लाह के रसूल की सुन्नत के मुताबिक है , उदहारण के तौर पर : कोई आदमी जब अपनी पत्नी या संतान को चूमता है तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वोह उनकी पूजा करता है अर्थात यह एक प्रेम है जो खून के रिश्ते के लिए उमड़ता है , इसी तरह हजरे अस्वद को चूमना या छूना एक प्रेम है जिसको करने का आदेश अल्लाह और उसके रसूल ने दिया है।

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