नमाज़ कैसे पढें? How to pray namaz in Hindi

नमाज़

नमाज़ के महत्व

(यह लेख डा नफीस अख्तर की किताब ईश्वर की सही पहचान से लिया गया है)

नमाज़ इस्लाम की रीढ़, दीन का स्तम्भ, मोक्ष की शर्त, र्इमान की रक्षक और पवित्रता की नीव हैं। दिन मे पॉच बार नमाज़ पढ़ने का आदेश हैं। यह निश्चित समय में 'अल्लाह' का स्मरण हैं। इस व्यवस्था का पालन करते हुए मुसलमान पॉच बार खुदा के सामने उपस्थित हो पाप-कर्म से बचने की प्रार्थना और सच्चार्इ के मार्ग पर अग्रसर होने की सामथ्र्य संचित करता हैं। यह सफलता की कुन्जी हैं। र्इश्वर की 'इबादत' का विधान हैं। नमाज़ प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह स्वतन्त्रता हो या दास, उनके लिए सनद नही उतारी। हुक्म (शासनाधिकार) तो बस अल्लाह का हैं, उसने हुक्म दिया हैं कि उसके सिवा किसी की 'इबादत' न करो। यही सही और सीधा दीन (धर्म) हैं, परन्तु अधिकतर लोग नही जानते।

पांचों नमाज़ों का समय

फज्र (सूर्योदय से पहले)

जहर (मध्यान्ह के पश्चात)

अस्र (अपरान्ह के पश्चात)

अस्र (अपरान्ह के पश्चात)

इशा (रात्रि के प्रथम प्रहर में)

कुरान और नमाज़

फिर जब तुम नमाज़ पूरी कर चुको, तो खड़े, बैठे और लेटे हर समय अल्लाह को याद करो। फिर जब तुम्हे इत्मीनान हो जाए, तो पूरी नमाज़ 'कायम' करो। निस्संन्देह र्इमान वालों पर समय की पाबन्दी के साथ नमाज़ अदा करनी अनिवार्य हैं। 4 : सूर-ए-अन निसा : 103

सफल हो गया वह जिसने अपने को संवारा और अपने 'रब' के नाम का स्मरण किया तो नमाज़ पढ़ी। 87 : सूर-ए-अल-आला : 14, 15 ।

निस्सन्देह मैं अल्लाह हू। मेरे सिवा कोर्इ 'इलाह' नहीं। अत: तू मेरी इबादत कर और मेरी याद के लिए नमाज़ कायम कर। 20 : सूर-ए-ताहा : 14। À

नमाज़ किस के लिए अनिवार्य हैं?

धनवान हो या दरिद्र, रोगी हो या निरोग, यात्री हो या स्थायी रूप से रहने वाला सब पर प्रत्येक परिस्थिति मे अनिवार्य हैं। कोर्इ भी वयस्क व्यक्ति किसी भी स्थिति मे इससे मुक्त नही हो सकता। विशेष परिस्थितियों में 'कजा' द्वारा नमाज़ पूरी की जा सकती हैं। जकात, रोजा, हज्ज के सम्बन्ध मे कुछ शर्तो के उपरान्त छूट मिल जाती हैं। या उसमें कुछ रियायत की आज्ञा हैं, किन्तु नमाज़ के लिए ऐसी कोर्इ गुंजाइश नही हैं। यहा तक कि मैदान-ए-जंग मे भी नमाज़ फर्ज हैं।

नमाज़ कैसे पढें?

नमाज़ ऐसा अमल हैं जिसमें शरीर, बुद्धि और हृदय सम्मिलित होते हैं और इन तीनों में दर्शन और विवेक का सुन्दर सामंजस्य विद्यमान होता हैं। शरीर के हिस्से में कयाम, (खड़ा होना,) रूकूअ (घुटने पर हाथ रखकर झुकना) और सजदा (जमीन पर सर टेकता) आया हैं। जिब्हा के हिस्से मे तिलावत (कुरआन शरीफ की आयतें पढ़ना) और तस्बीह (र्इश्वर की महानता का वर्णन करना) आर्इ हैं। बुद्धि के हिस्से में चिंतन और हृदय के हिस्से मे र्इश्वर के प्रति तन्मयता और भक्ति भाव से हृदय का द्रवित होना आया हैं।

अतिरिक्त नमाज़ें

दिन मे पॉच बार की नमाज़ के अतिरिक्त र्इद, बकरीद, सूर्य या चन्द्र ग्रहण, विपत्ति, मरण आदि के समय भी नमाज़ कायम की जाती हैं। रमजान के महीने में तरावीह की नमाज़ पढ़ी जाती हैं। हजरत मुहम्मद सल्ल0 ने कहा हैं - सबसे पहली चीज जिसका कियामत के रोजे बंदे से हिसाब लिया जाएगा वह नमाज़ हैं। अगर यह ठीक रही तो वह कामयाब हुआ और अगर यह खराब निकली तो नाकाम और हुआ। अगर उसके फराइज मे कुछ कमी नजर आएगी तो अल्लाह तआला कहेगा कि देखों मेरे बन्दे के नामए-आमाल में कुछ नफली नमाज़े हैं। फिर उससे फराइज की कमी को दूर कर दिया जायेगा और बाकी आमाल के साथ भी यही मामला होगा। इस प्रकार इस्लाम में नमाज़ की महत्ता अन्य सिद्धान्तों की अपेक्षा अधिक हैं।

1.परिस्थितिवश यदि नमाज़ का निर्धारित समय व्यतीत हो जाये, तो इस्लाम में 'कजा' नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया गया है।

2.अबल-हसन अली नदवी, अरकान-ए-अरबअ : तिर्मिजी और नसर्इ, पृ0 181

(Book Name: इस्लाम एक अध्ययन:)

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