आवागमनीय पुनर्जन्म का सिद्धान्त, इस की अवैज्ञानिक्ता, सामाजिक परिस्थिति, वास्तविक्ता

परलोक

परलोक के प्रमाण

लेखक मौलाना सैयद हामिद अली

र्इश्वर मालिक और संप्रभुतासंपन्न है।

र्इश्वर कर्मो का बदला देने वाला हैं।

र्इश्वर न्यायप्रिय हैं।

र्इश्वर सर्वशक्तिमान हैं।

र्इश्वर सब कुछ जानने वाला और सबकी खबर रखने वाला हैं।

र्इश्वर तत्वदश्र्ाी और बुद्धि संपन्न है।

र्इश्वर कृपालु और कद्रदान (गुणग्राही) हैं।

र्इश्वर विश्व और मानव का स्रष्टा और पालनकर्ता हैं। इसलिए वही विश्व और मानव का एकमात्र स्वामी और शासक है। यह एक अकाट्य सत्य है और इस सच्चार्इ का स्वाभाविक परिणाम यह हैं कि इंसान र्इश्वर का दास और उसकी प्रजा हैं और उसके लिए अनुकूल आचरण सिर्फ यह हैं की वह र्इश्वर का दास और प्रजा बनकर रहे और निरापद रूप से र्इश्वर के आदेश का पालन करे। इसके अतिरिक्त जो आचरण भी वह अपनाएगा, वह सत्य के विरूद्ध और घातक होगा। '' हे लोगो ! अपने रब (पालनकर्ता, मालिक और स्वामी) की बंदगी करो, जिसने तुम्हे पैदा किया और तुमसे पहले के लोगो को भी। उम्मीद है कि इस तरह तुम (र्इश्वर के प्रकोप) से बच सकोगे।'' कुरआन-2:21

जैसा कि आयत का अंतिम अंश संकेत करता हैं कि र्इश्वर के मालिक और शासक होने का स्वाभाविक परिणाम यह हैं कि वह आज्ञाकारियों को पुरस्कार और अवज्ञाकारियों को दंड दे। सूर: फातिहा मे, जो कुरआन मजीद की पहली सूर: और पूरे कुरआन का सार और आधार है, र्इश्वर की विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार किया गया हैं:- '' सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए हैं, जो सारे संसार का 'रब' (पालनकर्ता, परवरदिगार, मालिक, हाकिम) हैं। कृपाशील और दयावान है, उस दिन का मालिक हैं, जिस दिन बदला दिया जाएगा।'' कुरआन-1:1-3

'यौमिद्दीन' शब्द बताते हैं कि ऐसा दिन आना चाहिए और वह दिन आएगा, जब इंसानों को उनके कर्मो का फल मिलेगा। उस दिन हिसाब लेने, फैसला सुनाने और फैसले को लागू करने के सारे अधिकार र्इश्वर के हाथ में होगे। उस दिन आज्ञाकारी 'जन्नत' पाएंगे और अवज्ञाकारी नरक के भयंकर अजाब (प्रकोप) में डाले जाएंगे। ''निस्संदेह नेक लोग (जन्नत की) नेमतों में होंगे और दुराचारी भड़कती आग में, जिसमें वे प्रवेश करेंगे बदला दिए जाने के दिन और उससे वे निकल नही सकेंगे। और तुम्हें क्या मालूम कि क्या है बदला दिए जाने का दिन! फिर (कहता हूं), तुम्हे क्या मालूम कि क्या हैं बदला दिए का दिन! जिस दिन कोर्इ जीव किसी जीव के लिए कुछ न कर सकेगा और उस दिन संपूर्ण अधिकार और सत्ता अल्लाह के हाथ में होगी। -कुरआन-81:13-19

बदला दिए जाने का दिन-जैसा कि कुरआन मजीद की आयतों से स्पष्ट होता है-वर्तमान जीवन और वर्तमान संसार में नही, इस संसार के बाद अस्तित्व मे आने वाला एक 'शाश्वत लोक' और इस जीवन के बाद मिलने वाला एक शाश्वत जीवन 'परलोक' में होगा। जीवन और मुत्यु की यह महफिल, जिसका नाम संसार है, बदला पाने का स्थल नही, बल्कि कर्म -स्थल और परीक्षा - स्थल हैं। अत: पुरस्कार और दंड के लिए एक अन्य लोक और एक दूसरा जीवन चाहिए:- ''जिसने मृत्यु और जीवन का आविर्भाव किया, ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुम में कौन अच्छे-से- अच्छा कर्म करने वाला है।'' कुरआन-67:2 '' हर जीव को मृत्यु का स्वाद चखना है। और तुम्हे तुम्हारा भरपूर बदला 'कियामत' के दिन चुका दिया जाएगा, तो (उस दिन) जिसे नरक से बचा लिया गया और स्वर्ग में दाखिल कर दिया गया, तो निस्संदेह वह सफल हो गया।'' कुरआन-3:185 यह कुरआन का बयान ही नही हमारा अनुभव भी हैं कि इस दुनिया मे भले इंसानों को उनके अच्छे कामों का और बुरों को उनके बुरे कामों का पूरा-पूरा बदला नही मिलता। यही नहीं, ऐसा भी होता हैं और ऐसा बहुत होता हैं कि भले इंसानों को भले कामों के जुर्म में मुसीबतों और कष्टों से दो-चार होना पड़ता हैं, वे जेल की लौह शलाकाओं के पीछे बन्द कर दिए जाते हैं।

वे हृदयविदारक अत्याचारी और यातनाओं का शिकार होते हैं और अन्तत: फांसी के फंदे तक जा पहुंचते हैं,जबकि बहुत-से अत्याचारी, पापी और दुराचारी जिन्दगी भर मजे लूटते रहते हैं।चंगेज, हलाकू, तैमूर, हिटलर और स्टालिन ने लाखो-करोड़ो लोगो पर जुल्म व सितम के पहाड़ तोड़े, परन्तु उन्हे दुनिया में सजा तो क्या मिलती, वे जिन्दगी भर ऐश और सत्ता के मजे लूटते रहे। इस स्थिति का क्या औचित्य हैं? क्या ऐसा है कि इंसाफ, भलार्इ नैतिकता और मानवता गलत हैं और अत्याचार, बुरार्इ, शैतानियत और पशुता एवं बर्बरता सही हैं? बुद्धि और विवेक रखने वाला कोर्इ व्यक्ति इसका उत्तर 'हां' में नही दे सकता। फिर क्या इसका कारण यह है कि दुनिया अंधेर नगरी हैं और यहां का राजा-खुदा-चौपट राजा है और यहां अच्छार्इ का बुरा और बुरार्इ का अच्छा बदला मिलता हैं? यदि इस स्पष्टीकरण को भी बुद्धि क्ो भी एवं चेतना के जीवित रहते नही माना जा सकता है, तो फिर यही बात सत्य हैं की यह दुनिया कर्मफल पाने की जगह नही, बल्कि कर्म करने की जगह हैं। यहां हर व्यक्ति की परीक्षा हो रही हैं और विपत्तियां और कठिनाइयां तथा भोग विलास आदि परीक्षा के विभिन्न प्रश्नपत्र हैं। दुनिया की यह जिंदगी, कर्म हेतु मिला अवकाश हैं, फिर प्रत्येक व्यक्ति को र्इश्वर के सामने हाजिर होना और अपने सभी कर्मो का जवाब देना हैं। ''हर जीव को मौत का मजा चखना हैं और हम (दुनिया में) तुम्हे दुख और सुख दोनों तरह की परक्षाओं से आजमाते हैं और तुम सब (कर्मो का फल पाने के लिए) हमारी ही ओर लौटाए जाओगे।'' कुरआन-21:35 ''उस दिन लोग (अल्लाह के सामने) पलटकर विभिन्न गिरोहों के रूप में आएंगे, ताकि उन्हे उनके कर्मपत्र दिखा दिए जाएं। तो जिसने कण भर भी भलार्इ की होगी, वह उसे देख लेगा और जिसने कण भर भी बुरार्इ की होगी, वह उसे देख लेगा।

आवागमनीय पुनर्जन्म का सिद्धान्त

(यह लेख डा0 नफीस की किताब (ईश्वर की सही पहचान ) से लिया गया है।

इस मान्यता के अनुसार वर्तमान जगत मे जितने भी प्राणी हैं उन्हें दो प्रकार की योनियों मे बाँटा गया है। कर्म योनि तथा भोग योनि। मानव योनि कर्म योनि हैं। शेष योनियाँ भोग योनि की श्रेणी मे आती हैं। वनस्पति, पशु, पक्षी, कीट आदि सब भोग योनि हैं, अर्थात पुर्व जन्म मे इनके कर्म ऐसे नहीं थे कि इन्हे वर्तमान जन्म मे उत्तम योनि अर्थात मानव शरीर प्राप्त होसके, इसलिए इन्हें इनके पूर्व कर्मों के अनुसार दन्डस्वरूप पेड़, पौधे, कुत्ते बिल्ली ,आदि पशुओं, मोर, कबूतर आदि पक्षियों के शरीर मे जन्म लेना पड़ा है। यह अपने कर्मों के फल भोग कर पुनः मानव शरीर प्राप्त कर जन्म मरण से मुक्ति हेतु प्रयास कर सकेंगे। मनुष्य योनि मे जन्म लेने वाले प्राणी भी एक समान नहीं हैं। इनमे भी विषमताएं हैं। कोई निर्धन है कोई धनवान, कोई अंधा है कोई आँख वाला, कोई राजा है कोई रंक, कोई सुखी है कोई दुखी, कोई शुद्र है कोई ब्रह्मण, कोई रोगी है कोई स्वस्थ। यद्यपि इन्हें कर्म योनि प्राप्त है लेकिन यह विषमताएं इनके पूर्वकर्मों का ही फल हैं। ईश्वर तो केवल न्याय कर रहा है, क्योंकि अप्राधी को उसके अप्राध की सजा मिलना ही न्याय है। आत्मा का प्रम लक्ष्य जन्मों के चक्र से छुटकारा पाकर प्रमानन्द की गति को प्राप्त करना है। इसे मोक्ष कहते हैं। सत्कर्म, आध्यात्म और सत्य ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं। यदि हम मोक्ष के हकदार न बन सके, तो हमारे वर्तमान कर्मों के अनुसार हम को किसी न किसी योनी मे जन्म लेना ही पड़ेगा।

इस सिद्धान्त की अवैज्ञानिक्ता

पहला प्रश्न

यदि मानव योनि कर्मयोनि है बाकी सब भोगयोनि, तो संसार का आरंभ मानव से ही होना चाहिए। क्योंकि कर्म से पहले भोग का प्रश्न ही नहीं उठता है। फिर यदि इस संसार मे सबसे पहले मानव आए फिर उन्हों ने कर्म किया। और कर्मानुसार उन्होंने पुनः वनस्पति, पशु, पक्षी के रुप मे जन्म लिया। तो सवाल यह है कि संसार के प्रारंभ मेजब अभी पशु, पक्षी और वनस्पति जगत था ही नहीं, मानव जीवित कैसे रहा। क्योंकि उसका जीवन वनस्पतियों और पशुओंके बिना तो सम्भव ही नहीं। विज्ञानानुसार भी संसार का आरंभ मानव से नहीं हुआ और न ही हो सकतालथा । मानव से पहले वनस्पति जगत और पशुजगत अस्तित्व मे आगये थे। विज्ञान के अनुसार तो संसार मे मानव का आगमन सबसे आखिर मे हुआ। इस हिसाब से कर्म तथा भोग योनि पर आधारित यह सिद्धान्त अवैज्ञानिक एवं अतार्किक साबित होता है।

दोसरा प्रश्न

संसार मे आज ऐसे लोगों की संख्या कितनी है जो धर्मानुसार ईश्वरीय मार्ग पर चलते हुए सतकर्म कर रहे हैं, जवाब दस प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकता है। अब इस सिद्धांत के अनुसार जो सतकर्मी हैं वही अगले जन्म मे मानव शरीर पा सकते हैँ। उसमे कुछ तो मोक्ष प्राप्त कर अगले जन्म से छुटकारा पा जाएंगे। जब दस प्रतिशत लोग ही अगले जन्म मे मानव योनि पाने के योग्य हैं तो इस प्रकार मानव जनसंख्या लगातार कम होनी चाहिए। मगर जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, जो इस आवागमनीय मान्यता की सत्यता पर प्रश्न चिन्ह लगा रही है।

तीसरा प्रश्न

यदि पुलिस आपको आपके घर से बिना कोई वजह बताए गिरफतार कर ले। और फिर अदालत से बिना मोकदमा चलाए आप की फाँसी का आदेश होजाए। यहाँ भी आप को आप का अपराध ना बताया जाए। और अंत मे आप को फांसी घाट पहुंचा दिया जाए। आपको आप का अपराध बताने के बजाय यह कह दिय़ा जाए कि सजा खुद अपराध का सुबूत है। यदि तुम अपराधी न होते तो तो सजा क्यों होती। क्या आप इसे न्याय कहेंगें। कदापि नहीं। फिर यदि विक्लांगता, निर्धनता, दुख और रोग आदि पूर्व जन्म के अपराधों का दण्ड हैं तो जिनको भी यह दण्ड मिल रहा है। उन्हें अपने अपराधों की स्मृति क्यों नहीं। वनस्पतियों तथा पशुओं मे विवेक और चेतना भी नहीं होती कि वह जान सकें कि उन्हें किसी प्रकार का दण्ड मिल रहा है। क्या न्यायप्रिय ईश्वर बिना जुर्म बताए सजा दे रहा है। यह तो ज़ुल्म है, और ईश्वर अपने बन्दों पर कदापि ज़ुल्म नहीं करेगा।

चौथा प्रश्न

मानव जीवन पेड़ पौधों तथा जानवरों पर आश्रित है। पर्यावरण को दुरुस्त रखने के लिए भी जीव जन्तु तथा वनस्पतियों का होना ज़रूरी है। यदि जीव जन्तु तथा वनस्पतियाँ मानव द्वारा किए जाने वाले बुरे कर्म तथा अपराध का परिणाम हैं।तो इसका अर्थ है कि संसार की जीवन व्यवस्था के लिए बुराइयां और अपराध आवश्यक हैं। तत्वदर्शिता, न्याय तथा सन्तुलन पर आधारित इस कायनात के बारे मे ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता है।

पाँचवाँ प्रश्न

क्या दीन दुखियों की मदद करना पाप है ? क्योंकि यदि उन्हें ईश्वर की ओर से दण्डित किया जा रहा है तो दण्ड प्रक्रिया मे बाधा उत्पन्न करना पाप ही होना चाहिये। सत्यता यह है कि आवागमनीय पुनर्जन्म का सिद्दान्त न तो विज्ञानसंगत है और न ही वेदानुकुल। पण्डित सिद्धार्थ विद्यालंकार लिखते हैं वेदों मे आवागमन का सिद्धान्त नहीँ है । इस बात पर तो मैं जूआ भी खेल सकता हूँ ( अर्थात बाज़ी भी लगा सकता हूँ)

सामाजिक परिस्थिति

हर्ष वर्धन के पूर्वजों ने समाज में वर्ण-व्यवस्था की जड़ फिर से मजबूत करके ऊॅंचा-नीच श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ और छूतछात आदि को जो बढ़ावा दिया था, वह हर्ष वर्धन काल (606-647र्इ0) में बराबर जारी रहा। इस काल मे ंभारत की यात्रा करनेवाला चीनी यात्री फाहयान, लिखता है: शुद्र तो गए-गुजरे हैं ही, लेकिन शुद्रों में चांडाल सबसे अधम समझे जाते थे। वे राजज्ञानुसार, शहर में प्रवेश करते समय लकड़ी से ढोल बजाकर अपने आने की सूचना देते थे, ताकि लोग हट जाए और उनका स्पर्श बचाकर चले।'' सातवीं सदी के एक अन्य चीनी भारत-यात्री 'हवेनसांग' के अनुसार, '' शुद्रों के पश्चात, पंचम जाति के लोगो-कसाइयों, मछुआरो, जल्लादो और भंगियों के मकानों पर अलग-अलग निशान बने रहते थें और ये लोग नगर के बाहर रहते थे, उच्च वर्ग का कोर्इ आदमी रास्ते में मिल जाता तो ये ऑखें बचाकर बार्इ ओर को चले जाते और जल्दी से अपने घर में घुस जाते थे।''

वास्तविक्ता

यह लोक मानव के लिए प्रीक्षा स्थल है। ज्ञात जगत मे मानव एक मात्र प्राणी है जिसे कर्म की स्वतन्त्रता तथा बुद्धि विवेक प्रदान किया गया है। क्योंकि परीक्षा के लिए यह दोनो चीज़े अनिवार्य हैं। इस लिए इस जगत मे केवल मानव की प्रीक्षा हो रही है। वनस्पति, जीव जन्तु समेत समपुर्ण जगत मानव की सेवा हेतु पैदा किया गया है। संसार का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि संसार की सभी वस्तुएं मानव जीवन की किसी न किसी आवश्यक्ता की पूर्ति कर रही हैं। यह मानव के अप्राध कर्म का परिणाम नहीं है। बल्कि ईश्वर ने इन सबको मानव जीवन के रक्षार्थ हेतु सृजा है। मानव जगत मे विषमताएं अर्थात विक्लांगता, निर्धनता रोग, दुख, कष्ट, तथा स्वस्थ शरीर, धन, बल, सुख आदि किसी पूर्व जन्म का परिणाम नहीं, अपितु विभिन्न प्रकार के परीक्षा प्रश्न हैं जो विभिन्न व्यक्तियों को उनकी जन्मजात योग्यताओं के अनुसार सर्वज्ञ ईश्वर द्वारा दिया गया है। परीक्षा हेतु मानव को कर्म की स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है।

बुराई और भलाई मे से जिस मार्ग पर भी चलना चाहे चले। यद्यपि बुराई का मार्ग उसके अपने लिए घातक है। और भलाई का मार्ग उसे परम सफलता प्रदान करेगा। यदि ईश्वर मानव को उनकी इक्षा के बेग़ैर भलाई के रास्ते पर चलने के लिए बाध्य कर देता तो परीक्षा का उद्देश्य पूरा न हो पाता। कर्म की स्वतन्त्रता के कारण मनुष्य अपनी तुच्छ संसारिक कामनाओं के वश मे होकर हिंसा, अन्याय, शोषण और बुराई का रास्ता अपनाता है। दुनिया मे यदि हिंसा,बर्बर्ता, अन्याय और बुराई मौजूद है तो इस की वजह स्वयं इनसान हैं जो परीक्षा के लिए मिली हुई अपनी आजादी का गलत इस्तेमाल करता है। ईश्वर दो कारणों से इसमे हस्तक्षेप करता रहता है। एक जब नैतिक व्यस्था का बिगाड़ अपनी चरम सीमा पर पर पहुँच जाता है तो ईश्वर व्यस्था के बिल्कुल ध्वस्त होने से बचाने के लिए अत्याचारियों की कार्य अवधि समाप्त कर उन्हें हलाक कर देता है। और उनके हाथ से सत्ता की बागडोर छीन कर दोसरों को दे देता है। कुरान मे कहा गया है।

सअगर इस तरह अल्लाह इनसानो के एक गिरोह को दोसरे गिरोह के द्वारा हटाता न रहता तो धरती की व्यस्था बिगड़ जाती, लेकिन दुनिया के लोगों पर अल्लाह की बड़ी उदार कृपा है ( कि वह इस तरह बिगाड़ दूर करने का प्रबन्ध करता रहता है) अध्याय 2 आयत 251) दोसरे ईश्वर इनसानों के कुछ कर्मों ( न कि सभी ) का परिणाम उन्हे इस दुनिया मे भी दिखाता रहता है ताकि वह होश मे आ जाएं। कुरान मे ईश्वर कहता है कि थल और जल मे लोगों के अपने हाथों की कमाई से बिगाड़ उत्पन्न हुआ ताकि ईश्वर मज़ा चखाए इनके कुछ कर्मों का, शायद वह ( अपनी हरकतों से) बाज़ आएँ । ( अध्याय 30 आयत 41) जब किसी व्यक्ति की मृत्यु का समय आ पहुँचता है तो इसका अर्थ होता है कि उसकी परीक्षा का ईश्वर द्वारा निर्धारित समय पूरा हो चुका है। अतः उसकी आतमा को शरीर से पृथक कर दिया जाता है। एक दिन ऐसा आने वाला है जब यह पूरी सृष्टि नष्ट कर दी जाएगी, क्योंकि समस्त इनसानों की परीक्षा समाप्त हो चुकी होगी। यह जगत प्रीक्षा की दृष्टि से बनाया गया है , इसलिए यह प्रीक्षा के लिए ही अनुकुल स्थान है, परिणाम के लिए नहीं।

अतः इस पूरे जगत का नष्ट करके एक दोसरा जगत बनाया जाएगा जिसे प्रलोक कहते हैं। यह परिणाम स्थल है जहाँ मनुष्यों को पुऩः जीवित करके खुदा की अदालत मे खड़ा किया जाएगा । उस परिणाम दिवस का न्यायधीश ईश्वर स्वयं होगा। हर बनदे को उसके कर्मों के हिसाब से पुरस्किरित अथवा दण्डित किया जाएगा , स्वर्ग अथवा नरक। पर्लोक का जीवन शाश्वत और अनन्त होगा। मृत्यु का प्रावधान खत्म कर दिया जाएगा। स्वर्ग अथवा नरक मानव का स्थाई ठिकाना होंगे। पाठकों को सलाह दी जाति की प्रलोक को सविस्तार और प्रमाणों सहित समझने के लिए मधुर सन्देश संगम नई दिल्ली से प्रकाशित सैयद हामिद

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