कुरान की विशेषताएं- क़ुरआन और विज्ञान, कुरआन सुरक्षित ग्रंथ

कुरान की विशेषताएं

कुरान की विशेषताएं

कुरान मानवरचित ग्रंथ नहीं है बल्कि यह ईश्वर की वाणी है जो हजरत मुहम्मद (स.अ) पर फरिश्ता के माध्यम से अवतरित हुआ। यह कुल 114 अध्यायों मे विभाजित है। यह एक क्रांतिकारी पुस्तक है जिसके बारे एक विद्वान लिखते है। "'क़ुरआन ऐसी पुस्तक है जिसके आधार पर एक क्रांति ‎लाई गई। रेगिस्तान के ऐसे लोगों को जिनका विश्व के मानचित्र में उस ‎समय कोई महत्व नहीं था। क़ुरआन की शिक्षाओं के कारण, उसके ‎प्रस्तुतकर्ता के प्रशिक्षण ने उन्हे उस समय की महान शाक्तियों के समक्ष ला ‎खड़ा किया और एक ऐसे क़ुरआनी समाज की रचना मात्र २३ वर्षों में की ‎गई जिसका उत्तर विश्व कभी नहीं दे सकता।

आज भी दुनिया के करोड़ों मुसलामान मानते है कि क़ुरआन और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ‎ने एक आदर्श समाज की रचना की। इस दृष्टि से यदि क़ुरआन का अध्ययन ‎किया जाए तो आपको उसके साथ पग मिला कर चलना होगा। उसकी ‎शिक्षा पर विचार करें। केवल निजी जीवन में ही नहीं बल्कि सामाजिक, ‎राजनैतिक और क़ानूनी क्षैत्रों में, तब आपके समक्ष वे सारे चरित्र जो क़ुरआन ‎में वर्णित हैं, जीवित दिखाई देंगे। वे सारी कठिनाई और वे सारी परेशानी ‎सामने आजाऐंगी। तन, मन, धन, से जो समूह इस कार्य के लिए उठे तो क़ुरआन की हिदायत हर मोड़ पर उसका मार्ग दर्शन करेगी। क़ुरआन विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरा है, और उसके वैज्ञानिक ‎वर्णनों के आगे वैज्ञानिक नतमस्तक हैं। जिस समय क़ुरआन अवतारित हुआ उस युग में उसका मुख्य ‎चमत्कार उसका वैज्ञानिक आधार नहीं था। उस युग में क़ुरआन का ‎चमत्कार था उसकी भाषा, साहित्य, वाग्मिता, जिसने अपने समय के अरबों ‎के भाषा ज्ञान को झकझोर दिया था। यहां स्पष्ट करना उचित होगा कि उस ‎समय के अरबों को अपने भाषा ज्ञान पर इतना गर्व था कि वे शेष विश्व के ‎लोगों को गूंगा कहते थे। क़ुरआन की शैली के कारण अरब के ‎भाषा ज्ञानियों ने अपने घुटने टेके''

कुरआन एक सुरक्षित ग्रंथ है

आज दुनिया भर मे कुरआन की जितनी प्रतियां पायी जाती हैं किसी मे एक बिंदु का अंतर नहीं है। आप भारत के किसी दूरस्थ गाँव की किसी मस्जिद से कुरआन लेकर किसी अफ्रीकी देश के गाँव मे मौजूद कुरआन से मिलान करें। एक मात्रा का भी फर्क नहीं मिलेगा। और नवीनतम छपे हुए कुरान तथा संग्रहालयों मे रखे हुए प्राचीन से प्राचीन कुरआन मे एक शब्द का अंतर भी नहीं मिले गा। यह विशेषता किसी अन्य धर्मग्रंथ की नहीं है। दुनिया भर मे 50 लाख से अधिक व्यक्तियों को पूरा कुरआन कंठस्थ है। और लगभग प्रत्येक मुसल्मान को कुरआन के दस बीस अध्याय ज़बानी याद होते हैं। लेकिन कभी कुरआन के किसी शब्द अथवा बिंदु के बारे मे आपस मे किसी का मतभेद नहीं होता। यह विशेषता भी केवल कुरआन को हासिल है। ऐतिहासिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि इस धरती पर उपस्थित हर क़ुरआन की प्रति वही मूल प्रति का प्रतिरूप है जो हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ‎पर अवतरित हुई थी। कुरआन मे ईश्वर कहता है ''निस्सन्देह यह जिक्र अर्थात कुरआन हमीं ने उतारा है और हम निश्चय ही इसे सुरक्षित रखेंगे।' –( सुरः हिज्र 9) इस का अर्थ यह हुआ कि इसके वजूद को कभी होई हानि नहीं हो सकती, इस के सम्मान को कोई आघात नहीं पहुंचा सकता और इसका रूप और इस की हैसियत किसी भी परिवर्तन की पहुँच से परे है।

क़ुरआन हर प्रकार के विभेदों से मुक्त हैः

मानव कितना बड़ा विद्वान क्यों न हो जाए उस से ग़लतियाँ और कोताहियाँ हाती ही रहती हैं। उसका लेखन और भाषण त्रुटियों से सुरक्षित नहीं रह सकता। ईसी लिए क़ुरआन में एक स्थान पर ईश्वर का कथन हैः " क्या यह लोग क़रआन में चिंतन मनन नहीं करते, यदि यह ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से होता तो अवश्य उसमें बहुत कुछ मतभेद पाते।" (सूरः 4 आयत 82) 'यकीनन यह एक किताबे अज़ीज़ है। असत्य न इसके आगे से इसमें राह पा सकता है, न इसके पीछे से। ( सूरः49 आयत 41-42) परन्तु क़ुरआन हर प्रकार की ग़लतियों आपत्तियों और कमियों से सुरक्षित है। विज्ञान की तरक्की के इस युग मे इनसान की सोच, विचार मे विशाल परिवर्तन आचुका है। पुरानी मान्यताएं धराशायी हो गयी हैं. लेकिन कुरआन मे आज भी कोई चीज़ विज्ञान की दृष्टि से गलत साबित नहीं की जा सकी है।

क़ुरआन और विज्ञान

पवित्र क़ुरआन में मानव भ्रूण के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को इस प्रकार बयान किया गया हैः " हमने इनसान को मिट्टी के सत से बनाया, फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बुंद बना कर रखा। फिर हमने उस बूंद को लोथड़ा का रूप दिया। फिर हमने उस लोथड़े को बूटी का रूप दिया। फिर हमने बोटी की हड्डियाँ बनाईँ। फिर हमने उस हड्डियों पर मास चढ़ाया। फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप दे कर खड़ा किया।" ( सूरः 23 आयत 12-14)

कनाडा यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर मूरे इस आयतों के सम्बन्ध में लिखते हैं: "अत्यधिक अनुसंधान के पश्चात जो तथ्य हमें क़ुरआन और हदीस से प्राप्त हुए हैं वास्तव में वह बहुत चौंकाने वाले हैं क्योंकि यह तथ्य सातवीं ईसवी के हैं जब भ्रूणकी के बारे में बहुत कम अध्ययन हुआ था। भ्रूण के सम्बन्ध में सब से पहला अनुसंधान जो ऐरिक स्टेट द्वारा टिकन के अण्डे पर किया गया उसमें भी इस अवस्थाओं का बिल्कुल उल्लेख नहीं है।" इसके बाद प्रोफेसर मूरे ने अपना निष्कर्ष कुछ इस प्रकार दिया हैः "हमारे लिए स्पष्ट है कि यह तथ्य मुहम्मद सल्ल0 पर अल्लाह की ओर से ही आया है क्योंकि इस (भ्रुणकी) सम्बन्ध की खोज हज़रत मुहम्मद सल्ल0 की मृत्यु के बहुत बाद में हुई। यह हमारे लिए स्पष्ट करता है कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए संदेष्टा हैं।"( Moore, K.L, The Development Human, 3th Edition, W.B Saunders co. 1982) )

प्रोफेसर तेगासान ने जब सन्1995 में रियाज़ (सऊदी अरब) में होने वाली सभा में निम्न आयत पर चिन्तन मनन कियाः " जिन लोगों ने हमारी आयतों का इन्कार किया उन्हें हम जल्द ही आग में जोंकेंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे ताकि वह यातनाओं का मज़ा चखते रहें"। तो अन्त में उन्होंने अपना विचार इन शब्दों में व्यक्त किया : " मैं विश्वास करता हूं कि क़ुरआन में जो कुछ भी 14-00 वर्ष पूर्व लिखा जा चुका सत्य है जो आज अनेकों वैज्ञानिक स्रोतों द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। चूंकि हज़रत मुहम्मद सल्ल0 पढ़े लिखे न थे अतः वह अल्लाह के संदेष्टा ही हैं और उन्होंने योग्य सृष्टा की ओर से अवतरित ज्ञान को ही समस्त मनुष्यों तक पहुंचाया, वह योग्य सृष्टा अल्लाह ही है। इस लिए लगता है कि वह समय आ गया है कि मैं गवाही देते हुए पढ़ूं: " ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए (अन्तिम) संदेष्टा हैं।"

विज्ञान ने आधुनिक खोज द्वारा यह सिद्ध किया है कि पहाड़ों की जड़ पृथ्वी के नीचे हैं जो पृथ्वी को डुलकने से बचाता है और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए महत्वपूर्ण भुमिका अदा करता है। इस तथ्य की ओर क़ुरआन ने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व संकेत कर दिया थाः "क्या हमने पृथ्वी को बिछौना और पर्वतों को मेख़ नहीं बनाया?" । ( सूरः 78 आयत 6-7) एक दूसरे स्थान पर फरमायाः " और हमनें ज़मीन में पहाड़ जमा दिए ताकि वह इन्हें ले कर ढुलक न जाए"। ( सूरः 21 आयत 31)


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