बहुदेववाद और साकार उपासना, पुर्वजों की पूजा प्राकृति की पूजा

एकेश्वरवाद

एकेश्वरवाद Monotheism

(यह लेख डा नफीस अख्तर की किताब ईश्वर की सही पहचान से लिया गया है)

सृष्टि और कायनात की रचना एवं इसमे कार्यरत सुव्यवस्था पर विचार अथवा चिंतन करने से सर्वप्रथम सत्य यह सामने आता है कि सृष्टिकर्ता कायनात का स्वामी और जगत का नियन्ता ईश्वर अपने अस्तित्व तथा गुणों मे एक और अकेला है। यदि ब्रहमाण्ड के स्वामी, नियामक और नियन्ता एक से अधिक होते तो इसमे अव्यवस्था होती और कायनात नष्ट होजाती। (कुरान अध्याय 21 आयत 22) अखिल संसार मे एकरूपी व्यवस्था और एक समान नियमों का पाया जाना ईश्वर के एक होने की ओर इंगित करता है।

गुरुत्वाकर्षण के नियम, प्रकाश का वेग,उष्मा तथा उर्जा के सिद्धांत पूरे ब्रहमाण्ड मे एक समान हैं। जगत के सभी पदार्थों की संरचना प्रमाणुओं से होती है और सभी प्रमाणुओं की संरचना मे भी समानता है। सभी जीव कोशिकाओं से बने होते हैं, और इन कोशिकाओं मे भी संरच्नात्मक तथा किर्यात्मक समानताएं पाई जाती हैं। ऐसा होना संसार की नियामक, प्रबंधक तथा सृजक सत्ता के एकत्व के बिना संभव ही नहीं।

फिर पूरा ब्रहमाण्ड एक पूर्ण इकाई के रूप मे कार्यरत है, जिसका प्रत्येक अवयव दोसरे का पूरक एवं प्राश्रित है। सब मे परस्पर सहयोग सामंजस्य और सहकारिता विद्यमान है। जो प्रबन्धक एवं रचयिता के एक होने का प्रमाण है। और जब वह अपने अस्तित्व मे अकेला है तो अनिवार्यतः अपने गुणों मे भी अकेला होगा । क्योंकि सृष्टि के समस्त गुण सृष्टा के गुणों की छाया और प्रभाव मात्र हैँ। ईश्वर के गुण प्रफेक्ट,असीम नित्य एवं उसका अभंजित पूर्ण एकाधिकार हैं। और सृष्टि के गुण सीमित, ईश्प्रदत्त तथा अनित्य हैं।


बहुदेववाद और साकार उपासना

उपर्युक्त प्रमाणों से यह सिद्ध हो जाता है कि बहुदेववाद सर्वथा निराधार और तर्कविहीन है। वास्तविक्ता यह है कि विश्व के सभी धर्म सिद्धांत से एकेश्वरवादी हैं, सब का एकमेव मत है कि सृष्टि कर्ता सृष्टि प्रबन्धक ईश्वर एक और अकेला है। प्रंतु इस्लाम को छोड़ कर सभी धर्म व्यवहार एवं कर्मकाण्डों से बहुदेववादी हो गये हैं। ईसाइयों मे ट्रिनिटी तथा हिंदुवों मे मूर्ति पुजा के रूप मे बहुदेववाद प्रचलित है। हर समुदाय ने पृथक पृथक अपने उपास्य और आराध्य बना लिए हैं। कोई रामभक्त है, कोई कृष्णभक्त तो कोई हनुमानभक्त। कोई विष्णु का पुजारी है तो कोई शिव का उपासक।

असंख्य पुज्य हैं. किसी व्यक्ति के लिए सबकी आराधना और पूजा संभव नहीं है। इसलिए हर समुदाय ने अपने अलग अलग पूज्य बना लिया है। ईश्वर निराकार है और उसे निराकार ही होना चाहिए। कियोंकि आकार नाम है सीमाओं का ,और ईश्वर तो असीम है ,सीमाओं के बंधन से मुक्त। वह सर्वशक्तिमान है,कायनात की तमाम शक्तियों का स्रोत। आज केवल एक प्रमाणु की शक्ति का ज्ञान हमे आश्चर्यचकित कर दे रहा है। ब्रह्माणड मे निहित समस्त शक्तियों का स्रोत जो ईश्वर है तथा प्राकृति की तमाम वस्तुएं(सुर्य,चाँद, समुंद्र तथा आकाशगंगाएं) जिसके वशीभूत हैं, उस असीम शक्तियों का स्वामी ईश्वर सीमाओं के बंधन मे कैसे समा सकता है। साकार एवं सशरीर वस्तुओंका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित होता है।

हम सशरीर हैं ,इसलिए हमारा ज्ञान एवं क्रमक्षेत्र भी सीमित है। ईश्वर ऐसा कदापि नहीं हो सकता। साकार वस्तुएं समय और स्थान की मोहताज होती हैं। समय और स्थान के परिधिसे परे इनका अस्तित्व संभव नहीं है। ईश्वर आत्मनिर्भर है। वह समय स्थान जैसे भौतिक परिमापों का मोहताज नहीं। समय स्थान ईश्वर द्वारा ब्रह्माण्ड की रचना के पश्चात अस्तित्व मे आये हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि महाविस्फोट की घटना के बाद समय स्थान जैसे परिमाप वजूद मे आये थे। ईश्वर तो नित्य और अनादि है। समय और स्थान से पुर्व भी वह था। इसलिए ईश्वर को समय स्थान से मुक्त एवं निराकार सत्ता मानना ही तर्कसंगत है। उस निरकार ईश्वर को निराकार मानते हुए भी जनमानस के लिए जब उसके गुणों को पृथक पृथक आकार देने की शुरुआत करदी गयी तो विचारों एवं सिद्धांतों का विशुद्ध एकेश्वरवाद धीरे धीरे व्यवहारों एवं कर्मकाण्डों के बहुदेववाद मे परिवर्तित होता चला गया।

ईश्वर के गुणों के अनुसार विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ बना ली गयीं,और इनका व्यक्तिगत स्वरूप तथा स्वतन्त्र अस्तित्व मान लिया गया। अब सृष्टि का रचयिता ब्रह्मा, उसका पालन पोषण करने वाला विश्णु, सृष्टि का नाश करने वाला शिव ,वायु, वर्षा, और अन्य प्राकृतिक व्यवस्थाओं के प्रबन्धक अलग अलग देवताओं को मान्यता देकर उनके अलग अलग आकार और मूर्तियाँ बनाकर पूजा की जाने लगी। हालाँकि यह एक ही ईश्वर के विभिन्न गुण थे। यदि निराकार उपास्य की निराकार उपासना पद्धति ही प्रचलित होती तो विशुद्ध एकेश्वरवाद कभी दूषित न होता और न ही समाज मे अनेकेश्वरवाद कभी पनपने पाता। अनेकेश्वरवाद ने समाज को भी खंडित कर दिया है।

शिवपूजक और विष्णुपूजक जैसे अलग अलग सम्पर्दाय पैदा हुए जिनमे आपस मे नफरत और परस्पर युद्ध का वातावरण रहा है। इसी कारणवश सभी धर्मों के मूलग्रन्थों मे साकार उपासना एवं मूर्ति पूजा को घोर अप्राध ठेहराया गया है। वेदों मे भी मूर्तिपूजा का निषेध है। यजुर्वेद (32:3) मे न तस्य प्रतिमा अस्ति अर्थात उसकी कोई प्रतिमा नहीं और यजुर्वेद (40:7) मे अकायम( कायारहित, शरीररहित) अवर्णम(छिद्ररहित),अस्नाविर (नाड़ी आदि बंधन से रहित), और स्वयंभू (अपने आप से विद्यमान) कहकर उसे निराकार सिद्ध किया गया है। इसलिए जो भी मूर्तियाँ हैं उनका निराकार ईश्वर से कोई संबंध नहीं हो सकता और न हीमूर्तिपूजा को ईश्वर की उपासना कहा जा सकता है। यजुर्ववेद का एक मंत्र है अन्धन्तमःप्रविशन्ति येअसंभुतिमुपासते ततो भुय S इव ते तमो यउ संभुतियां रताः (40: 9) अन्धकार मे प्रवेश करते हैं वे जो असंभुति (प्राकृतिक वस्तुओं जैसे अगनि, वायु पेड़ पौधे आदि)की उपासना करते हैं। और वे लोग तो इससे अधिक अऩ्धकार मे जाते हैं जो संभुति (प्राकृतिक वस्तुओं से निर्मित वस्तुएं जैसे मेज़ कुर्सी ,मूर्ति आदि की पूजा मे लगे रहते हैं।


पुर्वजों की पूजा

मूर्तिपूजा का चलन बढ़ा तो बात ईश्वर की कथित मूर्तियों तक सीमित न रही, बल्कि लोगों ने अपने मृत पुर्वजों की मूर्तियाँ बना कर उनकी पूजा अर्चना भी आरंभ कर दी। ईश्वर के बन्दों ( दासों) को ईश्वर का स्थान दे दिया गया । अब इससे बढ़कर ईश्वर का अपमान और क्या हो सकता है ? कुरान मे कहा गया है। कैसे नादान हैं यह लोग कि उनको अल्लाह ( ईश्वर) का साझी ठहराते हैं जो किसी चीज़ को पैदा नहीं करते बल्कि खुद पैदा किए जाते हैं। जो न इनकी मदद कर सकते हैं न उन्हें खुद अपनी मदद का ही सामर्थ्य ही प्राप्त है। ( अध्याय 7 आयत 191,192) फिर कहा गया कि अल्लाह का छोड़ कर तुम जिन्हें पुकारते हो ( उपासना करते हो) वे तो सिर्फ बन्दे हैं जैसे तुम बन्दे हो। ( अध्याय 7 आयत 194)


प्राकृति की पूजा

साकार पूजा ने एक दोसरा रूप लिया तो प्राकृतिक चीज़ों जैसे वायु, अग्नि, जल ,पृथ्वी, पर्वत, नदी, सुर्य, चन्द्र, समुन्द्र एवं वृक्षों तक को अपना उपास्य मान कर उनके सामने शीश नवाने लगा,और उनसे अपनी मुरादें मांगने लगा। इन विवेकहीन वस्तुवों को ईश्वर के स्थान पर रख कर उसकी पूजा उपासना करना केवल ईश्वर का अपमान नहीं, अपितु स्वयं मानव का अपमान भी है। मानव ब्रह्माण्ड का सर्वोत्कृष्ट प्राणी है।ईश्वर ने इन तमाम प्राकृतिक चीज़ों को मानव की सेवा के लिए पैदा किया है। मानव जीवन की आवश्यक्ताओं की पूर्ति के लिए ही ईश्वर ने सम्पूर्ण प्राकृति की रचना की है। कुरान मे कहा गया है कि उस ईश्वर ने ज़मीन और आसमान की सारी ही चीज़ों को तुम्हारी सेवा मे लगा दिया। सब कुछ अपने पास से, इनमे ईश्वर की निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो सोच विचार करते हैं। ( अध्याय 45 आयत 13)

अब हमारे लिए अपमानजनक ही तो है कि हम अपने ही सेवकों की पूजा करने लगें। उनके सामने हाथ जोड़ने लगें। बात अपमान की ही नहीं बुद्धिहीनता की भी है। यह सब चीज़ें विवेकहीन है। हम इनकी पूजा करें, इनके सामने सिर झुकाएं, हाथ जोड़ें या इनसे कुछ मांगें, सब व्यर्थ है। क्योंकि यह न कुछ देख सुन सकती हैं और न जान सकती हैं। कुरान के शब्दों मे। आखिर उस व्यक्ति से ज़्यादा बहका हुआ इन्सान और कौन होगा जो अल्लाह को छोड़ कर उनको पुकारे जो प्रलय तक उसे उत्तर नहीं दे सकते, बल्कि उन्हें यह भी नहीं पता कि पुकारने वाले उन्हे पुकार रहे हैं। ( अध्याय 46 आयत 5) और उस अवसर को याद करो जब इब्राहीम नबी ने अपने बाप से कहा था। पिता जी आप क्यों उन चीज़ों की उपासना करते हैं जो न सुनती हैं न देखती हैं, और न आपका कोई काम बना सकती हैँ। (अध्याय 19 आयत 42)

यदि आधी रात को आप का बच्चा बीमार हो जाए। आपातकाल मे आप के पास धन न हो। मांगने से भी कोई प्रबन्ध न हो पाए। आप चिंन्ताग्रस्त हो रहे हों। ऐसे मे एक व्यक्ति आप की आवश्यक्ता आप के बताए बिना समझ कर उपहारस्वरूप धन आपको भेंट करदे। उस धन से आप का बच्चा आपातकालीन उप्चार सेवा प्राप्त कर बिल्कुल स्वस्थ हो जाए। तोअवश्य आपको उस व्यक्ति का आभारी होना चाहिए । लेकिन यदि आप उस व्यक्ति का आभार व्यक्त करने के बजाय उस धन अथवा पैसों को ही नमन करने लगें, तो यह मूर्खता ही होगी । ठीक इसी तरह ईश्वर ने हमारे अस्तित्व तथा जीवन के रक्षार्थ हेतु बिना मांगे प्राकृति के रूप मे आवश्यक सामग्रियाँ तथा वस्तुएं प्रदान की है। बुद्धिसंगत यही है कि इसके लिए हम ईश्वर के कृतज्ञ हों न कि इन विवेकहीन वस्तुओं के। कुरान मे ईश्वर ने कहा है। तुम चाँद, सूरज ( अर्थात प्राकृतिक वस्तुओं) की पूजा न करो। पूजा करनी हो तो ईश्वर की करो जिसने इन को सृजा है। ( अध्याय 41 आयत 37)



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